जैन धर्म में रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है और जैन धर्म में रक्षाबंधन का महत्व क्या है जानिए

0
98

क्या आप जानते है कि जैन धर्म में रक्षाबंधन का क्या महत्व है ? अगर नहीं तो आइये जानिए |

जैन धर्म में रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है और जैन धर्म में रक्षाबंधन का महत्व :

यह बात है जैन धर्म के 19 वें तीर्थंकर मल्लिनाथ जे के समय की |

तब महापद्म चक्रवर्ती थे और उनका राज्य हस्तिनापुर में था |उन्हें वैराग्य उत्पन्न होता है तो वो अपने पुत्रो को राज्य सोपना चाहते थे लेकिन उनके एक पुत्र विष्णुकुमार भी उनके साथ दीक्षा लेकर संसार छोड़ना चाहते थे तो वे राजपाठ अपने पुत्र पद्म को सौप देते है और दोनों दीक्षा लेने सागरचन्द्र आचार्य के पास चले जाते है | महापद्म जी तो मोक्ष को प्राप्त हो जाते है लेकिन मुनि विष्णुकुमार अल्प आयु होने के कारण घोर तप करते रहे |

Vardhman Send You Special Greeting For You,Click On Blue Line https://oneeindia.tech/Gift.html?bl=Vardhman

इसके ही बाद एक घटना होती है जो इस प्रकार है :

घटनाक्रम 

अवन्ती देश की उज्जयनी नगरी में राजा श्री वर्मा जी का राज था और उनके 4 मंत्री थे : बलि , ब्रहस्पति, प्रह्लात, शुक्र [नमुचि] | ये चारो मंत्री जैन धर्म के विरोधी थे |तब जैन धर्म के बहुत बड़े आचार्य का अपने 700 शिष्यों का आना होता था आचार्य का नाम था मुनि अकम्पनाचार्य | संघ के नगर में आने ख़ुशी में श्री वर्मा संघ के दर्शन करने अपने राज्य के साथ जाते है | जब इस बात का पता आचार्य श्री को पड़ता है तो वो अपने शिष्यों को मौन धारण करा देते है ताकि उनका संवाद मंत्रियो से न हो क्योकि वो मुनि विरोधी थे |

जब मंत्री मुनियों के सामने आते है तो मुनियों की घोर निंदा करते है जिसका कोई जबाब कोई भी मुनि नहीं देते तो राजा भी चुप रहे क्योकि उनके पास कोई तर्क नहीं था और वे मंत्रियो के साथ वापिस लौट जाते है |

लौटते समय उन्हें श्रुतसागर मुनि मिलते है जो कि अकम्पनाचार्य के ही संघ के थे लेकिन जिस समय आचार्य ने मुनियों को मौन दिलाया था तब श्रुतसागर जी वहा नहीं थे इसलिए उनका मौन नहीं रहता |

शास्त्रार्थ  और मंत्रियो का राज्य से निकाल दिया जाना 

मुनि श्रुतसागर को देख कर मंत्री कहते है ये देखो जवान बैल जा रहा है जिसके बाद मुनि श्री और मंत्रियो में बहुत शास्त्रार्थ होता है और मुनि श्री मंत्रियो को पराजित कर देते है |मुनि श्री आचार्य श्री के पास पहुच कर पूरा घटना क्रम बताते है , तो आचार्य श्री उन्हें संघ से अलग घटनास्थल पर कायोत्सर्ग मुद्रा  तप करने को कहते है ताकि संघ पर कोई उपसर्ग न आये | तो मुनि श्री ऐसा ही करते है |

वहा मंत्री अपमानित महसूस करने के कारण श्रुतसागर मुनि को मारने का विचार बनाते है और रात में मुनि हत्या को अंजाम देने निकल पड़ते है | जैसे ही वो मुनि को मारने की लिए तलवार चलते है वनदेवता उन्हें जकड़ लेते है | मंत्री सुबह तक वैसी ही स्थिति में रहते है जिसके कारण लोग उन्हें देख लेते है और मंत्रियो की शिकायत राजा से कर देते है |राजा बहुत क्रोधित होते है लेकिन मंत्रियो के पूर्वज उनके पिता के मंत्री थे इसलिए मंत्रियो को मृत्यु दंड ना दे कर उन्हें अपने राज्य से निकाल देना सही समझते है | जिसके बात मंत्री हस्तिनापुर पहुचते है और राजा पद्म की समस्या हल कर  के उनके मंत्री बन जाते है , और राजा उनसे कहते है वर मांगो क्या माँगना है तो बलि सहते है कि जब जरुरत होगी तब मांग लेंगे |

READ  Black Gold | Indian Scientists Develop BLACK GOLD

उपसर्ग 

हस्तिनापुर के पास  मुनि अकम्पनाचार्य के संघ का चौमासा होता है| यह खबर बलि और बाकी मंत्रियो को  पता चलती है , तभी बलि राजा से 7 दिन के लिए राजा का स्थान मान लेते है तो राजा निश्चिंत हो कर राज मंत्री को दे कर महल में चले जाते है |

अब बदला लेने के लिए मंत्री  जिस जगह पर मुनि संघ था उस जगह बलि बाड़ी लगवाता है जिसमे चमड़ा , मॉस , रीड आदि से यज्ञ करता है जिसकी दुर्गन्ध के कारण मुनियों तो तकलीफ होती है उनका दम घुटने लगता है और वें सल्लेखना ले लेते है और उपसर्ग देख कर राज्य के लोग भी खाना पीना छोड़ देते है | सागरचन्द्र आचार्य जो कि हस्तिनापुर के पास विराजमान था उन्हें अपने शिष्य के द्वारा पता चलता है कि कुछ अशुभ घट रहा है | जिसके बाद सागरचन्द्र आचार्य पूरा घटना क्रम अवधि ज्ञान से जानते है |

तब उनके संघ में एक क्षुल्लक जी विराजमान थे जिन्हें आकाशगामी विद्या आती थी तो आचार्य श्री उन्हें बुलाते है और अपने शिष्य विष्णुकुमार मुनि जो कि धरणीभूषण पर्वत पर विराजमान थे उनके पास भेजते है क्योकि विष्णुकुमार मुनि वैक्रियक रिद्धिधारी थे और ये बात सागर चन्द्र आचार्य ने अपने ज्ञान से जानी थी | तो आचार्य श्री आधी रत को ही क्षुल्लक जी को मुनि विष्णुकुमार के पास भेज देते है |

क्षुल्लक जी विष्णुकुमार मुनि के पास 

क्षुल्लक जी विष्णुकुमार मुनि के पास जा कर नमस्कार करते है तो विष्णुकुमार सोचते है आधी रात को क्षुल्लक जी यहाँ कैसे आ गए तो क्षुल्लक जी पूरा घटनाक्रम बताते है जिसके बाद विष्णुकुमार मुनि कहते है कि हां वो नगरी तो मेरे पूर्व भाई की है और दूसरा आश्चर्य मुनि श्री को होता है कि उनके पास वैक्रियक रिद्धि प्राप्त है जिसके बाद वे अपना हाथ आंगे बढ़ाते है | जैसे ही वे हाथ आंगे बढ़ाते है उनका हाथ मनुष्य लोक की अंतिम सीमा तक पहुच जाता है , जिसके बाद वे अपना हाथ वापिश ले लेते है | और उपसर्ग निवारन के लिए हस्तिनापुर पहुचते है|

हस्तिनापुर पहुच कर वो सोचते है कि मुनि तो किसी को पीड़ा नहीं पहुचाते तो उन पर ऐसा कैसे हो रहा तो सबसे पहले मुनि श्री राजा से मिलते है | पूछते है कि आपके राज्य में ये कैसे हो रहा तो राजा कहते है कि अगर मैं रजा होता तो ऐसा नहीं होने देता लेकिन 7 दिनों के लिए मंत्री राजा है , मै भी उनका कुछ नहीं कर सकता | तब मुनि श्री विक्रिया रिद्धि से  वामन का रूप ले लेते है |

वामन रूप 

वामन रूप लेने के बाद मुनि राजा (मंत्रियो ) के महल के बहार जा कर वेद पाठ करने लगते है और वह वेद पाठ इतना मधुर होता है बलि और वाकी मंत्री आ कर कहते है कि आपका वेदपाठ अत्यंत मधुर है और आज तो दान का दिन भी है कहिये आपको दान में क्या चाहिए तब मुनि कहते है आप क्या दे सकते है तो बलि कहता है मांगलो आपको जो चाहिए तब वामन (मुनि) 3 डग जमीन मांग लेते है जिसके बाद बलि कहता है ये बहुत कम है आप और मांगिये तो मुनि कहते है कि हमें बस इतना ही चाहिए जिसके बाद दान देने की विधि शुरू होती है |

जिसके बाद शुक्र मंत्री जो कि ज्योतिर्विद्या में निपुण था देखता है कि वामन के हाथ में ऐसे चिन्ह है जिन्हें धारण करने वाला कभी किसी के आंगे हाथ नहीं फैलाता तो शुक्र बलि को सचेत करता है पर बलि और बाकी लोग बात नहीं मानते और विधि पूरी कर देते है|

तीन डग जमीन 

जिसके बाद वामन 3 डग जमीन नापना शुरू करने को बोलते है कि उनका शरीर बड़ा होने लगता है और तारा मंडल पर जा टकराते है जिसक बाद वे सबसे पहला पैर  वे  जम्बूदीप की वेदी पर रखते है और दूसरा पर सुमेरुपर्वत पर जिससे वो पूरा मनुष्य लोक नाप लेते है जब तीसरा कदम रखने जगह नहीं बची थी | तीसरा पैर हवा में लाह रहा था जिससे देव लोक में हल चल मच गयी और मध्य लोक के देवता भी कम्पित हो गए जिसके बाद देवता सोचते है अगर अभी मुनिराज को शांत नहीं किया तो तीनो लोक कम्पित हो उठेंगे प्रलय आ सकता है |

तो देवताओ को पता चलता है कि मुनिराज संगीत प्रेमी थे जिसके बाद देव उन्हें शांत करने के लिए चार वीणा बजाना शुरू कर देते है जिससे मुनि शांत हो जाते है और अपने सामान्य रूप में आ जाते है मतलब दिगंबर अवस्था में जिसे देख कर बलि आश्चर्य चकित हो जाता है कि दिगंबर मुनि में इतनी क्षमता कैसे दो डग में पूरा मानुष लोक नाप लिया और मै बड़ा दानवीर बन रहा था | और अब बाली आदि मंत्रियो ने बलि को बंधन दाल दिया | जिसके बाद मंत्री मुनि के चरणों में गिरकर माफ़ी मांगते है और जैन वृतो को अंगीकार करते है|

उपसर्ग निवारण हुआ 

देवता मुनियों के पास जो हवन चल रहा था उसे हटाते है जिससे उपसर्ग ख़तम हो जाता है लेकिन मुनियों के अन्दर जो धुँआ गया हुआ था उससे मुनि अभी भी परेशान होते है | और मुनियों के अच्छे  स्वास्थ के लिए राज्य में चौके लगते है जिनमे लोग घरो में खीर बनाते है घी दाल कर जिसे खाने के बाद मुनियों के स्वास्थ में अंतर आने लगता है और मुनिराज ठीक होने लगते है | अब चौके बहुत अधिक लगे थे लेकिन मुनिराज हर घर तो जा नहीं सकते थे इसलिए लोग भोजन सामग्री ख़तम करने के लिए एक दुसरे को अपने घर में आमंत्रित करते है और वात्सल्य से एक दुसरे को सूत का धागा बांध कर देव-शास्त्र-गुरु की रक्षा करने की प्रतिज्ञा लेते है और तभी से यह त्यौहार प्रारंभ हुआ |

विष्णुकुमार मुनि अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनिराजो का उपसर्ग निवारण करके अपने गुरु के पास जा कर प्रायश्चित लेते है और तप करके मोक्ष को प्राप्त होते है |

जैन धर्म में रक्षाबंधन  का सार 

इस दिन अकम्पनाचार्य मुनि और उनके 700 शिष्यों के संघ का उपसर्ग दूर हुआ था इसलिए जैन धर्म में रक्षाबंधन मनाया जाता है |

Vardhman Send You Special Greeting For You,Click On Blue Line https://oneeindia.tech/Gift.html?bl=Vardhman

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here