नोबेल पुरस्कार |5 भारतीय वैज्ञानिक जो नोबेल पुरस्कार से वंचित रह गए।

0
85
नोबल पुरस्कार,Nobel Prize
Source:- The Secret of The Universe

नोबेल पुरस्कार उतना ही विवादास्पद हो सकता है जितना कि यह प्रतिष्ठित है। बहुत बार, कई वैज्ञानिक विशेष क्षेत्र में अपनी कड़ी मेहनत के बावजूद स्पॉटलाइट से बाहर रह जाते हैं। भौतिकी में 1965 के नोबेल पुरस्कार के विजेता रिचर्ड फेनमैन ने

एक बार कहा था कि इस पुरस्कार की अवधारणा भ्रामक है। किसी के शोध को “नोबेल” के रूप में वर्गीकृत करना एक अच्छा विचार नहीं है। प्रत्येक शोध किसी न किसी तरह से ‘नोबेल’ है। यहाँ कुछ प्रतिष्ठित भारतीय वैज्ञानिकों की कहानियाँ हैं जिन्होंने दुनिया की हमारी समझ में तथा भौतिक विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन दुर्भाग्य से, राजनीति के कारण या अन्य कारण से, स्वीडन में कभी शीर्ष सम्मान “नोबेल पुरस्कार” नहीं जीत पायें।

1. जगदीश चंद्र बोस:-

नोबेल पुरस्कार, The Nobel Prize
Jagadish Chandra Bose

यह विचार कि विद्युत चुम्बकीय तरंगों का एक स्पेक्ट्रम मौजूद है, पहले जेम्स मैक्सवेल द्वारा सैद्धांतिक रूप से आगे रखा गया था। लेकिन मैक्सवेल की 1879 में मृत्यु हो गई और वह अपने विचार के प्रायोगिक सत्यापन का गवाह नहीं बन सका। इस विचार ने दुनिया के कई लोगों का ध्यान आकर्षित किया, जिसमें कलकत्ता में जे.सी. बोस भी शामिल थे। बोस के अनुवर्ती माइक्रोवेव अनुसंधान का पहला उल्लेखनीय पहलू यह था कि उन्होंने तरंगों को मिलीमीटर स्तर (लगभग 5 मिमी तरंग दैर्ध्य) तक घटा दिया। उन्होंने अपने प्रकाश जैसी गुणों का अध्ययन करने के लिए लंबी तरंगों के नुकसान का एहसास किया।

नवंबर 1894 में कोलकाता के टाउन हॉल में सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान, बोस ने बारूद प्रज्वलित किया और मिलीमीटर रेंज वेवलेंथ माइक्रोवेव का उपयोग करके कुछ दूरी पर एक घंटी बजाई। लेफ्टिनेंट गवर्नर सर विलियम मैकेंजी ने कोलकाता टाउन हॉल में बोस के प्रदर्शन को देखा। बोस ने एक बंगाली निबंध, अदृश्य आलोक (द इनविजिबल लाइट) में लिखा, “अदृश्य प्रकाश आसानी से ईंट की दीवारों, इमारतों आदि से गुजर सकता है। इसलिए, तारों के मध्यस्थता के बिना इसके माध्यम से संदेश प्रेषित किया जा सकता है।” बोस ने रॉयल सोसाइटी, लंदन में प्रस्तुत एक पेपर में “टेलीफोन डिटेक्टर के साथ लौह-पारा कोहेरर” के विकास की घोषणा की।

हालांकि, बोस ने अपने काम के लिए कभी नोबेल नहीं जीता। इनके स्थान पर 1909 में मारकोनी को नोबेल पुरस्कार दे दिया गया।

2. सत्येंद्र नाथ बोस:-

Nobel Prize
Satyendra Nath Bose

जगदीश चंद्र बोस के एक छात्र एस.एन. बोस एक उल्लेखनीय सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी थे। वे एक स्व-शिक्षित विद्वान और एक बहुश्रुत थें, उनके पास भौतिकी, गणित, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, खनिज विज्ञान, दर्शन, कला, साहित्य और संगीत सहित विभिन्न क्षेत्रों का व्यापक ज्ञान था । उन्होंने भारत में कई अनुसंधान और विकास समितियों में कार्य किया।

एस.एन. बोस को के. बनर्जी (1956), डी.एस. कोठारी (1959), एस.एन. बागची (1962) और ए.के.दत्ता(1962) में बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी और एकीकृत क्षेत्र सिद्धांत में उनके योगदान के लिए भौतिकी में नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया। 12 जनवरी 1956 के पत्र में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के प्रमुख केदारेश्वर बनर्जी ने नोबेल समिति को निम्नानुसार लिखा था: “१.एस. एन. बोस ने बोस-सांख्यिकी को विकसित करके भौतिकी में बहुत ही उत्कृष्ट योगदान दिया। हाल के वर्षों में इस सांख्यिकी का मूलभूत कणों के वर्गीकरण में गहरा महत्व पाया जाता है और परमाणु भौतिकी के विकास में इसका बहुत योगदान है। २.1953 से अब तक की अवधि के दौरान उन्होंने आइंस्टीन के यूनिटी फील्ड थ्योरी के विषय पर दूरगामी परिणाम के कई बेहद दिलचस्प योगदान दिए हैं। ”बोस के काम का मूल्यांकन नोबेल कमेटी के विशेषज्ञ ओस्कैन क्लेन ने नहीं किया था। उनका(बोस) काम नोबेल पुरस्कार के योग्य है।

परन्तु नोबेल समिति ने कभी भी एस एन बोस को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान नहीं किया। हालांकि इस दशक के सबसे महत्वपूर्ण खोज ” हिग्स बोसोन” ( गॉड पार्टिकल) की खोज में बोसॉन को सत्येंद्र नाथ बोस के नाम पर उनके सम्मान में नाम दिया गया है।

3.नरिंदर सिंह कपनी:-

नोबेल पुरस्कार, the Nobel Prize
Narinder Singh Kapany

Fiber Optics के आविष्कारक, व ऑप्टिकल संचार के लिए तंतुओं(fibers) में प्रकाश के संचरण से संबंधित काम के लिए नरिंदर सिंह कपनी सबसे अधिक योग्य नोबेल पुरस्कार विजेता थे। लेकिन यह पुरस्कार चार्ल्स काओ को दिया गया था।

READ  Black Gold | Indian Scientists Develop BLACK GOLD

यहाँ तक कि “फाइबर ऑप्टिक्स” शब्द भी 1960 में नरिंदर सिंह द्वारा दिया गया था। नरिंदर सिंह पंजाब के जन्में देहरादून से हाईस्कूल व आगरा विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया व Imperial College London से PhD किया। वहाँ उन्होंने प्रकाश के गमनपथ शोध का कार्य शुरू किया।

इन्हें “The Man Who Bent The Light” नाम से भी जाना जाता है, दुर्भाग्य से हम में से बहुत से कम लोग इस महान वैज्ञानिक के बारे में जानते होंगे। नरिंदर सिंह एक Entrepreneur,कृषक के रूप में भी अपना योगदान दिया है। डॉ. नरिंदर कपनी उन कुछ प्रतिष्ठित भारतीयों में से एक हैं जिन्होंने वास्तव में आधुनिक दुनिया के कार्यों पर प्रभाव डाला है। Dr. Kapany वास्तव में एक प्रेरणादायक व्यक्त्वि हैं।

AD

4. E.C.G. सुदर्शन:-

Nobel Prize
E.C.G. Sudarshan

E.C.G. सुदर्शन ने 1960 में रोचेस्टर विश्वविद्यालय में क्वांटम प्रकाशिकी के क्षेत्र में अपना काम शुरू किया। हालांकि, उनके दृष्टिकोण की राय ग्लॉबर ने आलोचना की थी जो कि क्वांटम प्रकाशिकी में उनके सह प्रतिभागी थें।सुदर्शन को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए एक से अधिक अवसरों पर पारित किया गया था, जिससे 2005 में विवाद हुआ था, जब कई भौतिकविदों ने स्वीडिश अकादमी को लिखा था, जिसमें कहा गया था कि सुदर्शन को सुदर्शन विकर्ण प्रतिनिधित्व(सुदर्शन-ग्लॉबर रिप्रजेंटेशन) के लिए पुरस्कार का एक हिस्सा दिया जाना चाहिए। क्वांटम प्रकाशिकी में सुदर्शन-ग्लॉबर रिप्रजेंटेशन, जिसके लिए रॉय जे ग्लॉबर ने पुरस्कार का अपना हिस्सा जीता लेकिन ECG सुदर्शन को पुरस्कार से वंचित कर दिया गया ।

2007 में, सुदर्शन ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया, “2005 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मेरे काम के लिए दिया गया था, लेकिन मैं इसे पाने वालों में से नहीं था। प्रत्येक खोज में पाया गया कि यह नोबेल मेरे शोध के आधार पर काम के लिए दिया गया था।” सुदर्शन ने 1979 के नोबेल के लिए चयनित नहीं होने पर भी टिप्पणी की, “स्टीवन वेनबर्ग, शेल्डन ग्लासो और अब्दुस सलाम के नोबेल पुरस्कार मिलने के विषय पर मैं 26 साल के छात्र के रूप में काम किया था। यदि आप एक इमारत के लिए पुरस्कार देते हैं, तो क्या पहली मंजिल का निर्माण करने वालों को दूसरी मंजिल का निर्माण करने वालों से पहले पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए?”

ECG सुदर्शन ने Tachyon Particles का सिद्धांत भी रखा जो आइंसटीन की थ्योरी की प्रकाश से तेज कुछ नहीं को गलत सिद्ध करती है, हालांकि ऐसा कोई कण अभी तक अस्तित्व में नहीं आया है तथा ये एक हाइपोथेटिकल कण के ऊपर सिद्धान्त दिया गया है, ये आज भी चर्चा और शोध का विषय बना हुआ है। 

5.मेघनाद साहा:- 

5 indian physicists who missed the Nobel Prize
Meghnath Saha

मेघनाद साहा एक भारतीय खगोल भौतिकीविद् थे जिन्हें साहा आयनीकरण समीकरण के विकास के लिए जाना जाता था, जिसका उपयोग सितारों में रासायनिक और भौतिक स्थितियों का वर्णन करने के लिए किया जाता था। साहा पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने अपने तापमान के साथ किसी स्टार के स्पेक्ट्रम को संबंधित किया, थर्मल आयनिकरण समीकरण विकसित किए जो खगोल भौतिकी और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में मूलभूत थे।

साहा को 1930 में भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार के लिए देवेंद्र मोहन बोस और शिशिर कुमार मित्रा द्वारा नामित किया गया था। नोबेल समिति ने साहा के काम का मूल्यांकन किया। इसे एक उपयोगी अनुप्रयोग के रूप में देखा गया, लेकिन “खोज” नहीं। इस प्रकार उन्हें पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया।

साहा को फिर से 1937 और 1940 में आर्थर कॉम्पटन द्वारा पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था; और 1939, 1951 और 1955 में शिशिर मित्रा द्वारा। लेकिन नोबेल समिति अपने पिछले फैसले पर ही अड़े रहें। इस प्रकार एक और नोबेल पुरस्कार के योग्य वैज्ञानिक को इससे वंचित कर दिया गया

Read:- Indian Scientists Developed Black Gold.

READ  Amazon के जंगलों में लगी विशाल आग, वातावरण के लिए बड़ा खतरा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here